पुराने मित्र और मुलाकात

 🎀🐾"पुराने मित्र और मुलाकात" 🐾🎀

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जो बना रहा न, मैं भी कभी,
हाँ, शाम सुबह दिन रातों में!
कब बना अचानक पता नहीं,
कब कैद हुआ, जज्बातों में।
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जब निकले मेरे पंख देर से तो
मैं रहा न स्थिर, न रखा सबर।
जो याद मुझे थे मित्र मेरे मैं
मिल आया उन्हें छोड़ के डर!
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कभी सोचा कि रह जाऊँ यहीं,
फिर सोचा मैं चला जाऊँ घर।
पर मिले न सब जब वक्त पे तो
मुझे लगा मैं मानो गया बिखर।
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मुझे पता लगा तभी वहम मेरा
मैं सोच पड़ा क्यों फोकट सब!
थे मित्र जो अभी, इर्दगिर्द सभी,
उन्हें बांध रखा, हाँ, धन्य हैं रब।
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कुछ घर से दूर थे फौज में तो,
कई घर पर ही थे मजबूरन वो।
कुछ खोज रहे थे नई नौकरियाँ,
कई मिले ही नहीं, न जाने क्यों!
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पता था मुझे ऐसा तो होता ही है,
ज़िंदगी के पल परिवर्तनशील हैं।
जबरन पलों को कोसें ही क्यों!
जब खुद से ही सभी तब्दील हैं!


- ऋषि




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